Friday, 1 November 2013

वो एक  उलझन  है !
मम्मी के
उन के धागे
सी  उलझी  हुई !
वो अल्हड़ 
हवा में झूमते
पीपल के
पीले पत्ते  सी !
वो मीठी  है
मुह में
शक्कर  की
डली  सी !
वो
गहरी  है
समन्दर  कि  सी !
वो जेठ  की
दोपहर मे
ठंडी हवा
कि  सी !
वो अँधेरे  में
दिये सी !
वो  बच्चे  के
चेहरे कि हसी  सी !
वो अकेलेपन  में
कांधे सी !
वो 
बिलकुल  पगली
पगली सी !

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